मैं अक्सर सोचा करता था कि लोग आत्महत्या क्यों करते हैं,
वो लोग जीने से क्यों डरते हैं।
मैंने कईं बार समझना चाहा,मगर कुछ समझ नहीं पाया।
समझता भी कैसे , उनकी जगह खुद को रखता भी कैसे।
फिर हर बार एक ही निष्कर्ष पर पहुंच पाता, कि वो जरूर डरपोक था।
शायद ये इसलिए था ताकि मुझे और ज्यादा कोशिश ना करनी पड़े।
किसने सोचा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा,
समय अपना खेल दिखाएगा
आज मैं उसी राह पे खड़ा हूं,
जो समझना चाहता था, आज मैं उसे जी रहा हूं।
तो अब मैं समझा के जब हर सांस तुम्हारे सीने में चुभती हो,
जब आप रो रहे हो मगर आपकी आंखे सुखी हो,
जब हर धड़कन एक भोज लगती हो,
जब जिंदगी से आसान मौत लगती हो।
जब जिस चीज के खौफ से पूरी दुनिया चलती हो,
वहीं तुम्हें अपनी मंज़िल लगती हो,
तभी तो इसे खुदखुशी कहते हैं।
जब सब हो जाएगा तो लोग हमें डरपोक कहेंगे,
पर किसे परवाह हम तो यहां से कई दूर निकल चुके होंगे।
मगर मुझपे सवाल करने से पहले खुद से जरूर पूछना,
कि तुम कहा थे, जब मैं पूरी रात अपने बिस्तर पर रोया था।
तुम तब कहा थे जब मेरी खामोशी मेरे दर्द से भरी थी,
तब कहा थे जब मेरी मुस्कुराहट मेरे दर्द की गवाही दे रही थी।
अगर कोई हमें उस पल संभाल लेता,
आकर बस कुछ लम्हों के लिए गले से लगा लेता,
बस कुछ ना कहता और मेरे टुकड़ों को धीरे से समेट कर मुझे लौटा देता।
तो शायद मैं भी किसी और को संभाल लेता।